खाली घर, भरा मन: एम्प्टी नेस्ट का दुख और नई आज़ादी
आटा गूंधते हुए हाथ आज भी चार लोगों जितना आटा ले लेते हैं। फिर याद आता है कि अब खाने पर दो ही लोग हैं। आप दो लोइयां वापस डिब्बे में रखती हैं, और पता नहीं क्यों, आँखें भर आती हैं।
उसके कमरे का दरवाज़ा अब ज़्यादातर बंद रहता है। पोछा लगाते हुए आप वहां एक पल रुक जाती हैं। बिस्तर पर अब कपड़ों का ढेर नहीं, चार्जर का उलझा तार नहीं, देर रात तक बजता कोई गाना नहीं।
संक्षेप में: एम्प्टी नेस्ट, यानी बच्चों के घर छोड़ने के बाद का खालीपन, अक्सर उसी उम्र के आसपास आता है जब पेरिमेनोपॉज़ या मेनोपॉज़ चल रहा होता है। भारत में मेनोपॉज़ की औसत उम्र लगभग 46 से 47 साल है। दुख और आज़ादी, दोनों एक साथ महसूस करना पूरी तरह ठीक है। रोज़ 5 मिनट की धीमी सांस उस भारीपन को थोड़ी जगह दे सकती है।
एम्प्टी नेस्ट इतना भारी क्यों लगता है?
बीस साल से ज़्यादा आपका दिन उनके हिसाब से चला। सुबह का टिफ़िन, शाम का ट्यूशन, परीक्षा की रातें, दोस्तों के फ़ोन। फिर एक दिन स्टेशन या एयरपोर्ट पर हाथ हिलाया, और घर लौटकर दिन अचानक बहुत लंबा लगने लगा।
सवाल सिर्फ़ खालीपन का नहीं है। सवाल यह भी है: "अब मैं किसके लिए जल्दी उठूं?" जो पहचान इतने सालों से "माँ" के इर्द-गिर्द बनी थी, वह अपनी जगह ढूंढ रही होती है।
और इसी समय शरीर भी बदल रहा होता है। पेरिमेनोपॉज़ में हार्मोन के उतार-चढ़ाव से मूड पर असर पड़ सकता है। स्वान नाम की एक लंबी स्टडी में पाया गया कि पेरिमेनोपॉज़ में उदासी के लक्षणों का खतरा 2 से 4 गुना तक बढ़ जाता है। दोनों बदलाव एक साथ आएं, तो भारीपन दोगुना लग सकता है। यह आपकी कमज़ोरी नहीं है। मूड के इन उतार-चढ़ावों पर और यहां पढ़िए: मेनोपॉज़ में मूड स्विंग्स: असल में क्या हो रहा है।
एम्प्टी नेस्ट में दुख और आज़ादी: क्या दोनों साथ हो सकते हैं?
हां। आप उसे याद कर सकती हैं, और फिर भी सुबह की चाय बालकनी में अकेले, आराम से, पूरी गरम पीने का मज़ा ले सकती हैं। एक के होने से दूसरा झूठा नहीं हो जाता।
किसी दिन खालीपन चुभेगा। किसी दिन घर खुला आसमान लगेगा। दोनों दिन सच्चे हैं।
अपनी आज़ादी अच्छी लगे, तो गिल्ट भी आ सकता है: "मैं कैसी माँ हूँ जो खुश हूँ?" पर माँ होने से छुट्टी नहीं मिलती, बस उसका रूप बदलता है। आपको अपने लिए जीने की इजाज़त है। आज भी, और हर दिन।
अभी आज़माएं: उसके कमरे में 5 मिनट
- उसके कमरे में, या जहां उसकी याद सबसे ज़्यादा आती है, बैठ जाइए। बिस्तर के किनारे या कुर्सी पर।
- मुंह से तीन लंबी सांसें छोड़िए। आंसू आएं, तो आने दीजिए।
- सांस लेते हुए मन में किसी एक बात का नाम लीजिए जो आपको याद आती है: "उसकी हंसी।" "रात का शोर।"
- सांस छोड़ते हुए किसी एक बात का नाम लीजिए जो अब आपकी है: "मेरी सुबह।" "मेरा संगीत।" "मेरा समय।"
- यही 5 मिनट तक कीजिए। फिर खिड़की खोलिए, एक लंबी सांस लीजिए, और कमरे से बाहर आ जाइए।
यह अभ्यास दुख को भगाने के लिए नहीं है। यह उसे, और आपकी आज़ादी को, दोनों को जगह देने के लिए है। कोई सही या गलत शब्द नहीं। आप इसे गलत नहीं कर सकतीं।

खाली घर में अपने लिए क्या भरें?
आपको पूरी ज़िंदगी नए सिरे से प्लान करने की ज़रूरत नहीं है। आपको बस इस हफ़्ते एक छोटी चीज़ अपने लिए करने की ज़रूरत है।
- वह पुराना शौक जो अलमारी में रखा रह गया: सिलाई, गाना, पौधे, पेंटिंग।
- किसी सहेली के साथ हफ़्ते में एक बार बिना वजह की चाय।
- सुबह की धीमी सैर, बिना किसी के लिए जल्दी लौटने के।
- कोई नई चीज़ सीखना, चाहे वह एक नई रेसिपी ही क्यों न हो जो सिर्फ़ आपको पसंद हो।
क्या हो अगर यह खाली कमरा किसी दिन आपका कमरा बन जाए? पढ़ने का कोना, गाने का कोना, या बस दोपहर की झपकी का कोना।
शीशे में खुद को नए सिरे से देखने के बारे में यह लेख भी पढ़िए: शीशे में वो औरत: खुद से दोस्ती।
बच्चों से कैसे जुड़े रहें, बिना उन्हें बांधे?
रोज़ फ़ोन का इंतज़ार करना नहीं। हफ़्ते में एक तय समय, जब दोनों आराम से बात कर सकें।
उन्हें अपनी ज़िंदगी की बातें भी बताइए, सिर्फ़ उनका हाल न पूछिए। "आज मैंने छत पर नए गमले लगाए" उतना ही ज़रूरी है जितना "खाना खाया?" हो सकता है किसी दिन उनसे अपने बदलते शरीर की बात भी हो जाए: बेटी से मेनोपॉज़ की बात कैसे करें।
कब मदद लें?
अगर कई हफ़्तों से मन बहुत भारी है, और नींद, भूख या रोज़ के काम पर असर पड़ रहा है, तो डॉक्टर से बात कीजिए। यह सिर्फ़ "मन की बात" कहकर टालने वाली चीज़ नहीं है। और अगर कभी खुद को नुकसान पहुंचाने के ख़याल आएं, तो अभी अपनी स्थानीय इमरजेंसी सेवा या किसी क्राइसिस हेल्पलाइन से संपर्क कीजिए।
घोंसला खाली नहीं हुआ है। उसने बस अपना आकार बदला है।
आज शाम उसके कमरे में 5 मिनट बैठिए, या घोंसला बदलता है आकार: हिंदी अभ्यास चला लीजिए। और जब मन करे, सखी को बताइए कि आज घर कैसा लग रहा है।
5 मिनट। कोई चटाई नहीं। कोई मंत्र नहीं। बस आप।
महिलाएं अक्सर पूछती हैं
एम्प्टी नेस्ट क्या होता है?+
जब बच्चे पढ़ाई, नौकरी या शादी के लिए घर छोड़ देते हैं, तो माता-पिता को जो खालीपन और उदासी महसूस होती है, उसे एम्प्टी नेस्ट कहते हैं। यह कोई बीमारी नहीं, जीवन का एक बड़ा बदलाव है।
क्या एम्प्टी नेस्ट और मेनोपॉज़ एक साथ आ सकते हैं?+
हां, अक्सर दोनों एक ही उम्र के आसपास आते हैं। हार्मोन के बदलाव और घर का खालीपन, दोनों मिलकर मन को ज़्यादा भारी कर सकते हैं। यह आपकी कमज़ोरी नहीं है।
बच्चों के जाने के बाद आज़ादी अच्छी लगे तो क्या यह गलत है?+
बिल्कुल नहीं। बच्चों को याद करना और अपनी आज़ादी का आनंद लेना, दोनों एक साथ सच हो सकते हैं। आपको अपने लिए जीने की इजाज़त है।
एम्प्टी नेस्ट की उदासी में कब डॉक्टर से मिलें?+
अगर कई हफ़्तों से मन भारी है और नींद, भूख या रोज़ के काम पर असर है, तो डॉक्टर से बात कीजिए। खुद को नुकसान पहुंचाने के ख़याल आएं तो अभी इमरजेंसी सेवा या क्राइसिस हेल्पलाइन से संपर्क कीजिए।
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