अपने लिए समय: 5 मिनट लेने की इजाज़त है
दोपहर के ढाई बजे हैं। बर्तन धुल गए, कपड़े मशीन में घूम रहे हैं, और घर में पहली बार चुप्पी है। आप चाय का कप लेकर बालकनी की कुर्सी पर बैठती हैं। एक घूंट। दूसरा। और तभी अंदर से एक आवाज़ आती है: "ऐसे ख़ाली बैठी हूं? अलमारी ठीक करनी थी। कोई देख लेगा तो क्या सोचेगा?"
चाय अभी आधी है, पर आप उठ जाती हैं।
संक्षेप में: अपने लिए समय निकालना स्वार्थ नहीं है, और ना ही आलस। 40 के बाद, जब शरीर पेरिमेनोपॉज़ के बदलावों से गुज़र रहा हो, जो औसतन करीब 4 साल चलते हैं, रोज़ के सिर्फ़ 5 मिनट, जिनमें आप बस बैठें और सांस लें, थके हुए मन को थोड़ा ठहराव दे सकते हैं। इसके लिए किसी की इजाज़त नहीं चाहिए, बस अपनी।
अपने लिए समय निकालने पर अपराधबोध क्यों होता है?
क्योंकि हमें यही सिखाया गया। अच्छी बेटी, अच्छी बहू, अच्छी मां वो है जो सबसे आख़िर में खाती है, सबसे बाद में सोती है, और सबसे पहले उठती है। हमने अपनी मां को यही करते देखा, और उनकी मां को भी। आराम करती औरत को अक्सर "आलसी" कहा गया, और थकी हुई औरत से कभी पूछा ही नहीं गया कि वो कैसी है।
तो जब आप 5 मिनट के लिए बैठती हैं, तो आप अकेली नहीं बैठतीं। आपके साथ पीढ़ियों की वो आवाज़ भी बैठती है, जो कहती है, "उठो, काम पड़ा है।"
वो आवाज़ आपकी नहीं है। आप उसे सुन सकती हैं, और फिर भी बैठी रह सकती हैं।
40 के बाद ये 5 मिनट और ज़रूरी क्यों हो जाते हैं?
पेरिमेनोपॉज़ में नींद टूटती है, गर्मी की लहरें आती हैं, मन बिना वजह भारी हो जाता है। ये दौर औसतन करीब 4 साल चलता है, और कई औरतों के लिए उससे भी लंबा। इतने समय तक बिना रुके चलते रहना किसी भी शरीर के लिए भारी है।
और यही वो उम्र है जब ज़िम्मेदारियां भी सबसे ज़्यादा होती हैं: बढ़ते बच्चे, बूढ़े होते सास-ससुर या माता-पिता, घर, और शायद नौकरी भी। सब आपके सहारे टिके हैं। पर आपको कौन थामता है?
आपको छुट्टी की ज़रूरत नहीं, आपको बस दिन में 5 ऐसे मिनट चाहिए जिनमें कोई आपसे कुछ न मांगे। आप खुद भी नहीं।
अपने लिए 5 मिनट कैसे दिखते हैं?
ये कोई बड़ा इंतज़ाम नहीं है। ये नहीं: स्पा, छुट्टी, या घंटे भर की योग कक्षा। ये: चाय का पूरा कप, बिना उठे।
- पूजा के बाद, जब दीया जलता रहे और आप दो मिनट और बैठी रहें
- छत पर कपड़े सुखाने के बाद, धूप में एक पल खड़ी रहें
- गाड़ी पार्क करने के बाद, घर में जाने से पहले
- सबके सो जाने के बाद, बिस्तर के किनारे बैठकर
- दोपहर में, जब कपड़े मशीन में घूम रहे हों
इनमें कुछ भी "करना" नहीं है। यही तो बात है। अगर आप बड़े परिवार में रहती हैं, तो संयुक्त परिवार में अपने लिए 5 मिनट कैसे निकालें में और भी छोटे रास्ते हैं।
अभी आज़माएं: इजाज़त का पल
- फ़ोन उल्टा रख दीजिए और जहां हैं वहीं बैठ जाइए। चाय हो, तो कप दोनों हाथों में थाम लीजिए।
- मन में या धीरे से कहिए: "ये 5 मिनट मेरे हैं। मुझे इनकी इजाज़त है।"
- हथेलियां गोद में खुली रखिए, जैसे कुछ लेने के लिए तैयार हों।
- सांस को बदलने की कोशिश न कीजिए। बस देखिए कि वो कैसे आती है और कैसे जाती है।
- आख़िर में खुद से पूछिए: "मुझे अभी क्या चाहिए?" जो भी जवाब आए, उसे बस सुन लीजिए।
अपराधबोध बीच में आए, तो उसे आने दीजिए। उससे बहस न कीजिए। बस कहिए, "हां, मुझे पता है। फिर भी मैं बैठी हूं।" और अगली सांस पर लौट आइए।
पहली बार में ये अजीब लगेगा। शायद दूसरी बार भी। ये ठीक है। इसे गलत करने का कोई तरीका नहीं है।

अगर अकेले बैठना मुश्किल लगे, तो "पूरी तरह आराम की इजाज़त" वाला ये 5 मिनट का हिंदी अभ्यास आपको धीरे-धीरे उस आराम तक ले जाएगा।
घर वाले क्या कहेंगे?
शायद कुछ नहीं कहेंगे। शायद कहेंगे। अगर कोई पूछे, तो जवाब छोटा रखिए: "मैं 5 मिनट बैठी हूं, फिर आती हूं।" आपको कोई सफ़ाई देने की ज़रूरत नहीं।
और क्या हो अगर आपकी बेटी या बहू आपको ऐसे बैठा देखे, और उसे भी ये इजाज़त मिल जाए? जो हम नहीं देख पाईं, वो शायद वो देख ले। इस बातचीत के लिए बेटी से मेनोपॉज़ की बात कैसे करें पढ़ सकती हैं।
अगर थकान और उदासी 5 मिनट के आराम से भी नहीं जाती, और हफ़्तों से बनी हुई है, तो डॉक्टर से बात कीजिए। ये भी अपने लिए समय निकालने का एक तरीका है। और अगर किसी दिन मन इतना भारी हो कि खुद को नुकसान पहुंचाने के ख़याल आएं, तो अभी अपने इलाके की इमरजेंसी सेवा या किसी क्राइसिस हेल्पलाइन से संपर्क कीजिए।
सांस का एक आसान तरीका चाहिए, तो 5 मिनट के सांस लेने के व्यायाम देखिए।
आज कौन सा पल आपका होगा? चाय का अगला कप, या सबके सो जाने के बाद का वक्त? और अगर समझ न आए कि उस पल में क्या सुनें, तो सखी से पूछिए। वो आपकी बात सुनकर उस वक्त के लिए कुछ सुझाएगी।
5 मिनट। कोई चटाई नहीं। कोई मंत्र नहीं। बस आप।
महिलाएं अक्सर पूछती हैं
अपने लिए समय निकालने पर अपराधबोध क्यों होता है?+
क्योंकि कई घरों में औरतों को सिखाया गया है कि सबका ख़याल रखना ही उनका काम है, और आराम करना आलस है। ये सीख पुरानी है, सच नहीं। अपने लिए 5 मिनट लेना स्वार्थ नहीं है।
रोज़ अपने लिए कितना समय काफ़ी है?+
शुरुआत के लिए 5 मिनट काफ़ी हैं। रोज़ के छोटे पल, जिनमें आप बस बैठें और सांस लें, किसी लंबी छुट्टी के इंतज़ार से कहीं ज़्यादा आसानी से निभ सकते हैं।
संयुक्त परिवार में अपने लिए समय कैसे निकालें?+
छोटे पल ढूंढिए: पूजा के बाद, छत पर कपड़े सुखाने के बाद, या सबके सो जाने पर। कोई पूछे, तो छोटा सा जवाब दीजिए: मैं 5 मिनट में आती हूं।
क्या 5 मिनट आराम करने से सच में फ़र्क पड़ता है?+
धीमी सांस शरीर के आराम वाले मोड से जुड़ी है, और छोटे, रोज़ के ठहराव दिन को थोड़ा हल्का बना सकते हैं। अगर थकान या उदासी हफ़्तों तक रहे, तो डॉक्टर से भी बात कीजिए।
जहां भी हों, मुफ़्त सुनें